पश्चिम एशिया में तनाव के बीच तेल कंपनियों ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों में एक बार फिर बढ़ोतरी की है। सप्ताह के दूसरे दिन यानी मंगलवार को पेट्रोल और डीजल के दाम में लगभग 90 पैसे प्रति लीटर का इजाफा हुआ। एक सप्ताह से भी कम समय में यह दूसरी बार है जब ईंधन के दाम बढ़ाए गए हैं। हालांकि, ब्रोकरेज फर्म कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज का मानना है कि ये उपाय मौजूदा चुनौतियों से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक तेल विपणन कंपनियों (OMCs) को हो रहे भारी नुकसान की भरपाई नहीं हो पाएगी। ब्रोकरेज का कहना है कि नुकसान की पूरी भरपाई के लिए पेट्रोल और डीजल की कीमतों में अभी भी 13 से 17 रुपये प्रति लीटर तक की अतिरिक्त बढ़ोतरी की जरूरत पड़ सकती है। बता दें कि सरकारी तेल कंपनियों को फिलहाल हर महीने करीब 25,000 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है। डीजल पर अंडर-रिकवरी लगभग 11.40 रुपये प्रति लीटर और पेट्रोल पर 14.30 रुपये प्रति लीटर आंकी गई है
सोने के आयात शुल्क बढ़ाने का भी मामूली असर
बीते दिनों सरकार ने सोने पर आयात शुल्क बढ़ाने का ऐलान किया। हालांकि, ब्रोकरेज का मानना है कि सरकार द्वारा सोने के आयात शुल्क को 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत करना लंबे समय में ज्यादा प्रभावी साबित नहीं होगा। इससे घरेलू बाजार में सोने की कीमतें और बढ़ गई हैं, जिससे लोगों के पास मौजूद सोने की कुल वैल्यू भी बढ़ी है। कोटक के मुताबिक सोने पर जीएसटी बढ़ाना ज्यादा असरदार कदम हो सकता था, क्योंकि इससे खपत पर सीधा असर पड़ता।
जीडीपी पर क्या उम्मीद?
कोटक को अब उम्मीद है कि FY27 में भारत की GDP ग्रोथ 6% और औसत महंगाई दर 5% रहेगी। ब्रोकरेज के मुताबिक मैक्रोइकोनॉमिक आउटलुक ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो गया है क्योंकि कच्चे तेल की कीमतें उम्मीद से अधिक समय तक ऊंची बनी हुई हैं। युद्ध शुरू होने के बाद से ही कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के आस-पास बनी हुई हैं और कुछ समय के लिए तो ये 120 डॉलर प्रति बैरल के पार भी चली गई थीं। अगर ऐसे ही हालात रह गए तो सरकार के लिए महंगाई, राजकोषीय घाटा और चालू खाते के घाटे को एक साथ नियंत्रित करना मुश्किल हो जाएगा।
पीएम मोदी की अपील
बीते दिनों प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पश्चिम एशिया संकट के मद्देनजर विदेशी मुद्रा बचाने के लिए ईंधन के विवेकपूर्ण उपयोग, सोने की खरीद और विदेश यात्रा को स्थगित करने जैसे उपायों का आह्वान किया है। ऊर्जा की बढ़ती कीमतों से भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ रहा है और लगातार तीसरे वर्ष चालू खाते का घाटा बढ़ने का खतरा है। वहीं, कुछ राज्य सरकारों ने पहले ही विभागों को यात्रा सीमित करने, आमने-सामने की बैठकों से बचने और कम कर्मचारियों के साथ कार्यालय चलाने के निर्देश दिए हैं।

