ऋषिकेश, 3 अप्रैल: निजी स्कूलों और किताबों के व्यापारियों ने अभिभावकों को बंधक बना लिया है। बच्चों की शिक्षा के नाम पर किताबों और कॉपियों की कीमतें आसमान छूने लगी हैं, और अभिभावक इसकी चपेट में पूरी तरह से आ गए हैं। अभिभावकों का कहना है कि स्कूलों द्वारा महंगे प्रकाशकों की किताबों को थोपने से उनके बजट का बेड़ा गर्क हो गया है। किताबों की कीमतें 250 रुपये से लेकर 350 रुपये तक पहुंच चुकी हैं, जबकि कई कॉपियों को कम गुणवत्ता का बताते हुए ऊंची कीमतों पर बेचा जा रहा है।
वहीं, व्यापारियों की धांधली भी कम नहीं है। कई दुकानों पर कम जीएसएम वाली कॉपियों को ज्यादा जीएसएम बताकर ज्यादा कीमत वसूली जा रही है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि अभिभावकों को किताबों के खरीदारी के दौरान पक्का बिल भी नहीं दिया जा रहा है।
जबकि देहरादून में जिलाधिकारी के आदेश पर प्रशासन की ओर से कार्रवाई की जा रही है, ऋषिकेश में अधिकारियों की चुप्पी ने अभिभावकों में नाराजगी की लहर पैदा कर दी है। कई निजी स्कूलों ने किताबों और कॉपियों के लिए एक ही दुकान को अपनी पसंदीदा बना दिया है, जिससे अभिभावकों के पास दूसरा विकल्प नहीं बचा है।
यहां तक कि प्रशासन को इन समस्याओं का पता होने के बावजूद कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा रहा है। स्थानीय लोग और अभिभावक अब सवाल उठा रहे हैं कि क्या शिक्षा के नाम पर यह व्यापार करना सही है? क्या निजी स्कूलों और पुस्तक विक्रेताओं की मनमानी पर प्रशासन की चुप्पी व्यवस्था के खिलाफ एक बड़ा सवाल नहीं उठाती?
यह स्थिति अब अभिभावकों के लिए बर्दाश्त से बाहर हो रही है। इस लूट को रोकने के लिए अब सरकार और प्रशासन को तुरंत कदम उठाने होंगे, अन्यथा यह गुस्सा और बढ़ सकता है।
