मिडिल ईस्ट संघर्ष के बाद ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर कड़ा पहरा बिठा दिया है। इसके बाद से इस रूट से कच्चे तेल और एलपीजी गैस की आपूर्ति चरमरा गई है। भारत पर भी इसका खासा असर देखने को मिल रहा है। इस बीच केंद्र सरकार ने बड़ा फैसला किया है। तेल और गैस की जरूरतों को पूरा करने के लिए समुद्र के नीचे छिपे तेल के भंडार का पता लगाने के लिए एक सर्वे अभियान चलाया जाएगा।
सीएनएन न्यूज-18 ने अपनी एक रिपोर्ट में सरकारी दस्तावेजों के हवाले से कहा है कि, भारत सरकार का हाइड्रोकार्बन महानिदेशालय (DGH) बंगाल की खाड़ी में गहरे समुद्र के नीचे छिपे तेल और प्राकृतिक गैस के विशाल भंडारों का पता लगाने के लिए एक व्यापक सर्वेक्षण शुरू करने जा रहा है। मोदी सरकार देश के पूर्वी तट पर एक मल्टी-बेसिन भूगर्भीय सर्वेक्षण की योजना बना रही है। इसके लिए 14 मई 2026 को निविदाएं भी आमंत्रित कर दी गई हैं।
क्या है यह प्रोजेक्ट और कैसे होगा काम?
तकनीकी भाषा में इस परियोजना को 2D ब्रॉडबैंड मरीन सीस्मिक एंड ग्रेविटी-मैग्नेटिक डेटा एक्विजिशन, प्रोसेसिंग एंड इंटरप्रिटेशन कहा जाता है। आसान भाषा में कहें तो यह समुद्र तल का एक विशाल अंडरग्राउंड स्कैन है। इसके तहत विशेष सर्वेक्षण जहाज समुद्र में अपने पीछे लंबे केबल जैसे उपकरण खींचेंगे। इसे स्ट्रीमर्स कहा जाता है। ये उपकरण समुद्र के नीचे शक्तिशाली ध्वनि तरंगें भेजेंगे और चट्टानों से टकराकर वापस आने वाली गूंज को रिकॉर्ड करेंगे। इस डेटा के आधार पर वैज्ञानिक समुद्र तल के कई किलोमीटर नीचे की विस्तृत तस्वीरें तैयार करेंगे, जिससे तेल और गैस के स्रोतों का पता चलेगा।
लाखों किलोमीटर का दायरा
इस परियोजना का पैमाना बेहद विशाल है, जो अगले दो वर्षों तक चलेगा। बंगाल-पूर्णिया और महानदी बेसिन तक 45,000 लाइन किलोमीटर में सर्वे होगा। इसके अलावा अंडमान बेसिन में 43,000 एलकेएम, कृष्णा-गोदावरी (KG) बेसिन में 43,000 एलकेएम और कावेरी बेसिन में 30,000 एलकेएम में सर्वे होगा।
क्यों जरूरी है यह अभियान?
भारत अपनी कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 85 प्रतिशत और गैस की जरूरत का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है। पश्चिम एशिया में युद्ध या किसी भी वैश्विक संघर्ष का सीधा असर भारतीय घरों के बजट, ईंधन की कीमतों और महंगाई पर पड़ता है। अधिकारियों के अनुसार, मुंबई हाई जैसे पश्चिमी तटों की तुलना में भारत का पूर्वी तट अभी भी काफी हद तक अनछुआ है। आधुनिक सीस्मिक तकनीक के जरिए इस क्षेत्र का सटीक नक्शा तैयार कर भारत अपनी इस कमजोरी को दूर करना चाहता है।
इन 5 प्रमुख क्षेत्रों पर टिकी हैं उम्मीदें
1. बंगाल अपतटीय बेसिन: दस्तावेजों के अनुसार, यहां 10 किलोमीटर से अधिक मोटी तलछटी परतें हैं। यहां इओसीन युग से लेकर हाल के भूगर्भीय काल तक के हाइड्रोकार्बन स्रोत होने की संभावना है, जहां कई स्तरों पर गैस के संकेत पहले ही मिल चुके हैं।
2. महानदी बेसिन: अधिकारी इसे व्यावसायिक उत्पादन की उच्च क्षमता वाला क्षेत्र मान रहे हैं। यहां क्रेटेशियस काल से लेकर प्लियोसीन काल तक के गहरे पानी के जलाशय और बायोगैस सिस्टम मौजूद हैं।
3. अंडमान बेसिन: विशेषज्ञों का मानना है कि म्यांमार और इंडोनेशिया के गैस क्षेत्रों से भूगर्भीय समानता होने के कारण अंडमान में गैस का विशाल भंडार हो सकता है। यहां समुद्र के नीचे जमे हुए मीथेन के भंडार भी मौजूद हैं, जिन्हें भविष्य का ऊर्जा स्रोत माना जा रहा है।
4. कृष्णा-गोदावरी बेसिन: यह भारत का पहले से ही एक प्रमुख गैस उत्पादक क्षेत्र है, लेकिन नए सर्वेक्षणों से संकेत मिले हैं कि इसके गहरे हिस्सों में अभी भी भारी मात्रा में अनदेखे भंडार छिपे हो सकते हैं।
5. कावेरी बेसिन: यह भी एक प्रमाणित पेट्रोलीफेरस बेसिन है, लेकिन भूवैज्ञानिकों का मानना है कि इसके जुरासिक और गहरे अपतटीय क्षेत्रों में अभी भी बड़ी संभावनाएं खोजी जानी बाकी हैं।

