IITs में सुसाइड की वजह क्या, चौंका देंगे आंकड़े; सुप्रीम कोर्ट की रिपोर्ट भी शॉकिंग

आईआईटी बॉम्बे में सुसाइड की घटना ने एक बार फिर बहस ताजा कर दी है। इसके दायरे में देश भर के आईआईटी कैंपस में होने वाली आत्महत्या की घटनाएं हैं। केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने जुलाई 2023 में संसद में बताया कि 2018 से 2023 के बीच पांच साल में तमाम आईआईटीज को मिलाकर 39 छात्रों की मौत हुई है। हालांकि स्वतंत्र तौर पर किए जा रहे दावों में कहा गया है कि मौतों की संख्या कहीं ज्यादा है। हालांकि आईआईटी कैंपस में छात्रों की बेहतरी के लिए तमाम कोशिशें होती रहती हैं। लेकिन देश के सबसे बेहतरीन इंस्टीट्यूट्स में इस तरह का आंकड़ा परेशान करने वाला है। अभी तक इस समस्या को हल करने के लिए क्या-क्या उपाय किए गए हैं, आइए डालते हैं एक नजर…

संसद में क्या दिया गया जवाब

10 अगस्त को संसद में केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री सुकांत मजूमदार ने एक लिखित जवाब दिया। इसमें बताया किया कि शिक्षा मंत्रालय ने, मालवीय मिशन ट्रेनिंग प्रोग्राम के तहत आईआईटी कैंपस में पॉजिटिव मेंटल हेल्थ, जूझने की क्षमता और बेहतर स्वास्थ्य को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके अलावा उच्च शिक्षण संस्थानों की फैकल्टी के लिए राष्ट्रीय स्तर पर नेशनल कैपेसिटी-बिल्डिंग स्कीम भी चलाई जा रही है। इसके तहत, हर 15 दिन पर एक सेशन बुलाया जाता है। इसमें फैकल्टी मेंबर्स को भी शामिल किया जाता है, ताकि वह छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को समझ सकें और उन पर ध्यान दे सकें।

इसके अलावा मजूमदार ने आईआईटी हैदराबाद में 2024 और आईआईटी बॉम्बे में 2025 में हुए नेशनल वेलबीइंग कॉन्क्लेव के बारे में भी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इसी साल जुलाई में आईआईटी मद्रास में रीजनल मेंटल-हेल्थ वर्कशॉप आयोजित किया गया था। इसके अलावा विभिन्न आईआईटी कैंपस में काउंसिलिंग और वेलनेस सेंटर्स बनाए गए हैं। ठीक इसी तरह मेंटल वेलनेस और स्ट्रेस मैनेजमेंट पर आईआईटी मद्रास, आईआईटी दिल्ली, आईआईटी गुवाहाटी, आईआईटी गांधीनगर और आईआईटी रुड़की में भी वर्कशॉप की गई हैं।

सुप्रीम कोर्ट की टास्क फोर्स रिपोर्ट में क्या

सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त नेशनल टास्क फोर्स की छात्र मानसिक स्वास्थ्य पर अंतरिम रिपोर्ट इसी जून में जारी की गई। इसने संस्थानों की तैयारी में खामियों को उजागर किया। आईआईटीज के फैकल्टी मेंबर्स ने महसूस किया कि वे मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं को संभालने में अक्षम हैं। पैनल के अनुसार 90 फीसदी के पास छात्रों की इन चिंताओं को संभालने के लिए पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2025 में यह टास्क फोर्स बनाई थी। तब उसने उच्च शिक्षा संस्थानों में छात्रों के सुसाइड के चिंताजनक पैटर्न पर ध्यान दिया। यह कदम उस समय उठाया गया जब कोर्ट आईआईटी दिल्ली के दो अनुसूचित जाति वर्ग के छात्रों की 2023 में हुई मौतों से जुड़े केस की सुनवाई कर रही थी। इनके परिवारों ने जातिगत उत्पीड़न का आरोप लगाया था और एफआईआर दर्ज करने का अनुरोध किया था। कोर्ट ने कहा था कि बार-बार होती आत्महत्याएं इस बात की ओर इशारा करती हैं कि मौजूदा कानूनी और संस्थागत ढांचा छात्रों की मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं को संभालने और आत्महत्याओं को रोकने में अपर्याप्त और अप्रभावी हैं।

कॉम्पटीशन का प्रेशर

पैनल ने इस बारे में रिपोर्ट जारी की है। इसमें 31 केंद्रीय वित्त पोषित संस्थानों, जिनमें 23 आईआईटी शामिल हैं की प्रतिक्रिया शामिल की गई। इनमें 18 संस्थानों में कम से कम एक मेंटल हेल्थ काउंसलर था, लेकिन केवल चार ने फैकल्टी मेंटरशिप प्रोग्राम्स के लिए औपचारिक प्रशिक्षण की सूचना दी। वहीं, मात्र 10 ने सपोर्ट के लिए की जाने वाली पहल के औपचारिक प्रशिक्षण की सूचना दी। पैनल ने नोट किया कि ‘काउंसलर’ शब्द का इस्तेमाल संस्थानों में असंगत तरीके से किया जा रहा था। इससे यह आंकलन करना मुश्किल हो गया कि वास्तव में कितने प्रशिक्षित मानसिक स्वास्थ्य पेशेवर उपलब्ध थे।

टास्क फोर्स से बात करने वाले फैकल्टी मेंबर्स ने आईआईटीज में एकेडमिक कॉम्पटीशन वाले कल्चर का जिक्र किया। यहां पर सफलता का पैमाना, केवल ग्रेड, रैंक, प्लेसमेंट और पैकेज से ही तय होता है। पैनल ने पाया कि काउंसलर अक्सर परेशान छात्रों के बारे में बहुत देर से जान पाते थे। वजह, एक्टिव स्क्रीनिंग और फैकल्टी व हॉस्टल स्टाफ सहित सेंट्रल्ड रिपोर्टिंग सिस्टम की कमी थी।

जातिगत भेदभाव भी अहम पहलू

इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट के पैनल को एक और चौंकाने वाली बात पता चली। इसके मुताबिक कैंपस में सामाजिक समरसता को बढ़ावा देने की जरूरत महसूस की गई। संसद में 2023 में पेश रिपोर्ट में मौजूद आंकड़ों के मुताबिक 2018 से 2023 के बीच सात आईआईटीज में कुल 3542 छात्रों ने पढ़ाई छोड़ी। इसमें से करीब 60 फीसदी रिजर्व कैटेगरी के छात्र थे। 2066 ओबीसी, 1068 एससी और 408 एससी। रिपोर्ट में छात्रों और फैकल्टी के बीच सामाजिक असमानता पर भी बात की गई थी। इसके मुताबिक करीब 60 फीसदी आईआईटी छात्र एससी, एसटी और ओबीसी समुदाय से आते हैं। लेकिन फैकल्टी में मात्र 6.6 फीसदी एससी, 2.1 फीसदी एसटी और 21.3 फीसदी ओबीसी हैं।

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