छह साल के लंबे इंतजार और कूटनीतिक गतिरोध के बाद बहाल हुआ भारत-चीन सीमा व्यापार करीब तीन महीने ही चल सका। वर्ष 2019 से कोरोना और भू-राजनीतिक तनाव के चलते ठप पड़ा यह ऐतिहासिक अंतरराष्ट्रीय व्यापार चीनी प्रशासन की लेटलतीफी के कारण निर्धारित समय पर शुरू नहीं हो सका। अब चीन के तकलाकोट मंडी से भारतीय व्यापारी अपना कारोबार समेटकर स्वदेश लौट आए हैं।
भारत और तिब्बत (चीन) के बीच सदियों पुराना यह पारंपरिक व्यापार हर साल एक जून से शुरू होकर 31 अक्तूबर तक यानी पांच महीने चलता है,पर इस बार कूटनीतिक और प्रशासनिक औपचारिकताओं में फाइलें उलझने के कारण अनुमति अगस्त में मिली। अगस्त के शुरुआती दिनों में भारतीय व्यापारियों का पहला दल ऐतिहासिक लिपुलेख दर्रे के रास्ते तकलाकोट पहुंचा। तब तक आधे से अधिक कारोबारी सीजन बीत चुका था। तकलाकोट क्षेत्र में आगामी दिनों में बर्फबारी की आशंका को देखते हुए सभी व्यापारी 26 अक्तूबर को भारत लौट आए।
कम समय मिलने से कारोबारियों में निराशा
भारत-चीन सीमा व्यापार समिति के महासचिव दौलत सिंह रायपा ने कहा कि लिपुलेख व्यापार केवल दो देशों के बीच आर्थिक लेन-देन नहीं है, बल्कि धारचूला के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाले स्थानीय लोगों की आजीविका की रीढ़ है। छह साल बाद जब यह रास्ता खुला था, तो सीमावर्ती गांवों के लोगों के चेहरों पर रौनक लौट आई थी, लेकिन कारोबार के लिए पहले की अपेक्षा कम समय मिलने से व्यापारियों में निराशा है।
चरू, पश्मीना और जड़ी-बूटियों का काम प्रभावित
तकलाकोट की अंतरराष्ट्रीय मंडी में दोनों देशों के व्यापारी अपनी जरूरत का सामान एक-दूसरे से लेते हैं। भारतीय दल इस बार मिश्री, गुड़ और स्थानीय हस्तशिल्प लेकर पहुंचा था। बदले में वहां से पश्मीना ऊन,चरू, जड़ी-बूटियां मिलनी थीं।
74 लाख से अधिक का हुआ निर्यात
पिथौरागढ़। भारत-चीन अंतरराष्ट्रीय व्यापार में इस बार कारोबार बेहद कम रहा। बुधवार को एसडीएम आशीष जोशी ने बताया कि इस व्यापारिक सत्र के दौरान कुल 185 ट्रेड पास जारी किए गए थे, जिसमें 70 व्यापारियों और 115 हेल्पर्स के लिए अनुमति दी गई थी। पूरी प्रक्रिया के दौरान कुल 47 लोग चीन में प्रवेश कर व्यापार करने पहुंचे, जिसमें 31 व्यापारी और 16 हेल्पर शामिल रहे। बताया कि इस सत्र में कुल 74,95,000 रुपये के लगभग का निर्यात दर्ज किया गया। जबकि 74,51,000 रुपये का आयात हुआ।
