नैनीताल की 70 फीसदी से अधिक पहाड़ियां खिसक रहीं, 1880 जैसी बड़ी त्रासदी का डर

नैनीताल की पहाड़ियों को लेकर चौंकाने वाली रिसर्च सामने आई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि नैनीताल की 70 फीसदी से अधिक पहाड़ियां लगातार खिसक रही हैं। वैज्ञानिकों को 1880 जैसी बड़ी त्रासदी का डर है। इन पहाड़ियों की स्थिति को जानने के लिए वर्ष 2017 से 2024 के बीच सेंटिनल-1ए सैटेलाइट के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। शोध के दौरान पहाड़ियों में हलचल की औसत दर 10 से 19 मिमी सालाना रही। वर्ष 2023 में यह गतिविधि सबसे अधिक दर्ज की गई।

नैनीताल में कुल 68.62 वर्ग किमी क्षेत्र में किए गए इस शोध के अनुसार, दक्षिण-पूर्वी बलियानाला क्षेत्र हर साल 5 से 11 मिलीमीटर की दर से धंस रहा है। इसके विपरीत, शेर-का-डांडा रिज में भूमि 10 से 20 मिमी (औसतन 12 मिमी से अधिक) सालाना की दर से ऊपर उठ रही है। यह शोध 10 सितंबर को अंतर्राष्ट्रीय शोध जर्नल स्प्रिंगर नेचर के ‘बुलेटिन ऑफ इंजीनियरिंग जियोलॉजी एंड द एनवायरनमेंट’ में प्रकाशित हुआ है।

शोध में यूपीईएस देहरादून की अचला जोशी, डॉ. गिरीश चंद्र कोठियारी और अतुल के पाटीदार व अन्य विशेषज्ञों ने संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों की निगरानी की जरूरत बताई है। उपग्रह आधारित निगरानी से धीरे-धीरे खिसक रही जमीन और संभावित भूस्खलन वाले क्षेत्रों की पहचान की जा सकती है।

68.62 वर्ग किमी में 24.9% उच्च जोखिम में

अध्ययन में 68.62 वर्ग किमी क्षेत्र को भूस्खलन के खतरे के आधार पर तीन श्रेणियों में बांटा गया। इसमें 17.08 वर्ग किमी यानी 24.9% क्षेत्र उच्च जोखिम वाला मिला। 40.87 वर्ग किमी यानी 59.6 फीसदी क्षेत्र मध्यम और 10.66 वर्ग किमी यानी 15.5 फीसदी क्षेत्र कम जोखिम वाली श्रेणी में रहा। उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में बलियानाला और नैनीताल झील भ्रंश का दक्षिण-पूर्वी हिस्सा प्रमुख है।

कई सक्रिय भ्रंश और बारिश बढ़ा रहे खतरा

अध्ययन में भू-अस्थिरता को मेन बाउंड्री थ्रस्ट, नैनीताल झील भ्रंश, कृष्णनगर भ्रंश, मनोरा भ्रंश, रामगढ़ थ्रस्ट और ज्योल थ्रस्ट जैसी भूगर्भीय संरचनाओं से भी जोड़ा गया है। वैज्ञानिकों के अनुसार बारिश, कमजोर ढलान और मानवीय गतिविधियां मिलकर भूस्खलन का खतरा बढ़ा सकती हैं। वर्ष 2020 के बाद कई वर्षों में वार्षिक बारिश 2500 मिलीमीटर से अधिक रही।

1880 की त्रासदी आज भी चेतावनी

नैनीताल की पहाड़ियों की संवेदनशीलता का इतिहास गंभीर रहा है। 1880 में शेर-का-डांडा में हुए विनाशकारी भूस्खलन में 151 लोगों की मौत हुई थी। 1898 में कैलाखान में भूस्खलन में 28 लोगों की जान गई। हाल के वर्षों में 2018 में लोअर माल रोड का हिस्सा ढहा, 2022 में पाइंस और कैलाखान में सड़कें क्षतिग्रस्त हुईं। 2023 में चार्लटन लॉज, 2024 में टिफिन टॉप में भूस्खलन हुआ।

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