परमार्थ निकेतन में पांच दिवसीय मां शबरी रामलीला की शुरुआत सोमवार से हुई। यह रामलीला विशेषत वनवासियों, जन जातियों और आदिवासियों की संस्कृति, आस्था और जीवन मूल्यों को समर्पित है। इसमें ओडिशा एवं छत्तीसगढ़ के प्रतिभाशाली कलाकारों द्वारा संगीतमय नाट्य शैली में रामलीला की जा रही है। सोमवार को परमार्थ निकेतन में मां शबरी रामलीला का शुभारंभ परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानंद सरस्वती ने किया। इस मौके पर उन्होंने कहा कि मां शबरी रामलीला केवल एक नाट्य प्रस्तुति नहीं, बल्कि भारत की उन जड़ों का पुर्नआविष्कार है जो हमारी वनवासी और आदिवासी परंपराओं में रची-बसी है। मां शबरी की भक्ति का यही संदेश है कि ईश्वर किसी जाति, वर्ग, भाषा, क्षेत्र या सामाजिक पहचान की सीमाओं में बंधे नहीं हैं।
प्रभु श्रीराम वहां विराजते हैं, जहां प्रेम है, करुणा है, सेवा है और सबको अपनाने का भाव है। श्रद्धा और समर्पण के सामने सामाजिक भेदभाव का कोई स्थान नहीं है। इस दौरान ओडिशा एवं छत्तीसगढ़ के प्रतिभाशाली कलाकारों द्वारा संगीतमय नाट्य शैली में रामलीला की प्रस्तुति दी गई। जिसमें भारतीय लोककला, संस्कृति, संगीत और अभिनय-कौशल का संगम देखने को मिला। मौके पर विश्व मोहन शर्मा, मनोज त्यागी, सुमित कुमार, जितेंदर चौरसिया, डा. मुकेश कुमार, कलाकार राहुल, हितेश, चंचल, राहुल परिहार, हरमीत सिंह, निदेशक डॉ. अनु, चारू सिंह, उपनिदेशक प्रवीण आदि उपस्थित रहे।

