मकर संक्रांति सनातन संस्कृति का एक अत्यंत पावन और शुभ पर्व है, जो सूर्य उपासना, प्रकृति और मानव जीवन के बीच संतुलन का प्रतीक माना जाता है। यह पर्व सूर्य देव के मकर राशि में प्रवेश के साथ मनाया जाता है। इसी दिन से सूर्य उत्तरायण होते हैं और खरमास की समाप्ति के साथ शुभ कार्यों का आरंभ माना जाता है।
भारत के विभिन्न राज्यों में यह पर्व अलग-अलग नामों से मनाया जाता है। उत्तर भारत में मकर संक्रांति, गुजरात और महाराष्ट्र में उत्तरायण, तमिलनाडु में पोंगल और असम में माघ बिहू के रूप में यह पर्व श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। नाम भले ही अलग हों, लेकिन मूल भावना सूर्य देव की उपासना, दान और पुण्य अर्जन ही है।
देवताओं के दिन की गणना का आरंभ
शास्त्रों के अनुसार मकर संक्रांति से ही देवताओं के दिन की गणना प्रारंभ होती है। सूर्य के दक्षिणायन काल को देवताओं की रात्रि और उत्तरायण के छह महीनों को देवताओं का दिन कहा गया है। सूर्य का कर्क और मकर राशि में प्रवेश अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है, क्योंकि यह परिवर्तन छह-छह माह के अंतराल पर होता है। पृथ्वी की धुरी 23.5 डिग्री झुकी होने के कारण सूर्य छह माह उत्तरी गोलार्ध और छह माह दक्षिणी गोलार्ध के समीप रहता है।
मकर संक्रांति का वैज्ञानिक महत्व
वैज्ञानिक दृष्टि से मकर संक्रांति के बाद सूर्य के उत्तरायण होने से मौसम में बदलाव आने लगता है। ठंड धीरे-धीरे कम होने लगती है और दिन लंबे होने लगते हैं। भारत उत्तरी गोलार्ध में स्थित होने के कारण इस समय सूर्य की किरणें स्वास्थ्य के लिए लाभकारी मानी जाती हैं। इसी कारण इस पर्व पर सूर्योपासना को विशेष महत्व दिया गया है।
पौराणिक कथाएं और मान्यताएं
धार्मिक ग्रंथों में मकर संक्रांति का विशेष उल्लेख मिलता है। श्रीमद्भगवद्गीता में उत्तरायण को देवताओं का दिन और दक्षिणायन को देवताओं की रात्रि बताया गया है। मान्यता है कि उत्तरायण में देह त्याग करने वाले को मोक्ष की प्राप्ति होती है।
महाभारत काल में भीष्म पितामह ने सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा कर मकर संक्रांति के दिन ही प्राण त्यागे थे। इसके अलावा गंगा अवतरण की कथा भी इस पर्व से जुड़ी है। मान्यता है कि इसी दिन मां गंगा भागीरथ के पीछे-पीछे सागर से मिलीं, जिसके कारण गंगासागर में स्नान का विशेष महत्व है।
स्नान, दान और तिल का महत्व
मकर संक्रांति के दिन गंगा स्नान, तीर्थ स्थलों पर स्नान और दान को विशेष पुण्यकारी माना गया है। मान्यता है कि इस दिन किया गया दान सौ गुना फल देता है। तिल का विशेष महत्व है। तिल मिश्रित जल से स्नान, तिल का सेवन और तिल से हवन करने से पाप नष्ट होते हैं।
इस दिन खिचड़ी खाने की परंपरा भी वैज्ञानिक दृष्टि से लाभकारी मानी जाती है, क्योंकि यह पाचन तंत्र को मजबूत करती है और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती है।
पतंग उत्सव की परंपरा
मकर संक्रांति पर देश के कई हिस्सों में पतंग महोत्सव का आयोजन किया जाता है। सर्दियों के मौसम में सुबह के सूर्य प्रकाश में समय बिताने से शरीर को विटामिन-डी मिलता है, जो हड्डियों और त्वचा के लिए लाभकारी है। इस प्रकार पतंग उड़ाना केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि स्वास्थ्य से भी जुड़ा हुआ है।
धार्मिक, पौराणिक और वैज्ञानिक महत्व से परिपूर्ण मकर संक्रांति का पर्व भारतीय संस्कृति की समृद्ध परंपरा को दर्शाता है और हमें प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर जीवन जीने का संदेश देता है।


