NCERT बुक से हटेगा ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ वाला अध्याय; सूत्रों ने किया दावा, CJI ने जताई थी आपत्ति

एनसीईआरटी की कक्षा 8 की नई सामाजिक विज्ञान पाठ्यपुस्तक में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ से जुड़े विवादित हिस्से पर तीखी बहस छिड़ गई है। विवाद के बीच खबर है कि इस संवेदनशील खंड को हटा दिया जाएगा। दरअसल, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सुप्रीम कोर्ट में स्वतः संज्ञान लेते हुए इसे ‘संस्था को बदनाम करने’ का प्रयास करार दिया और साफ कहा कि न्यायपालिका की छवि पर कोई हमला बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। वहीं, एनडीटीवी ने सरकारी सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट किया है कि एनसीईआरटी की कक्षा 8 की पाठ्यपुस्तकों से न्यायपालिका के विभिन्न स्तरों पर भ्रष्टाचार के संदर्भ को हटा दिया जाएगा। सूत्रों के अनुसार, यह हिस्सा शुरू से ही नहीं लिखा जाना चाहिए था। उन्होंने कहा कि ऐसे पहलुओं को उजागर करना ‘उचित नहीं’ है और इसके बजाय ‘प्रेरणादायक बातें’ लिखी जानी चाहिए थीं।

रिपोर्ट में सूत्रों ने यह भी कहा कि पूर्व मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई का हवाला देना ‘सही नहीं’ और ‘उचित नहीं’ था। साथ ही बताया गया कि वर्तमान मुख्य न्यायाधीश ने भी इस पर नाराजगी जताई है। यह उद्धृत संदर्भ पूर्व मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई की जुलाई 2025 की टिप्पणी से लिया गया था, जिसमें उन्होंने न्यायपालिका के अंदर भ्रष्टाचार और कदाचार की घटनाओं से सार्वजनिक विश्वास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की बात कही थी। पुस्तक में उनके हवाले से लिखा था कि इस विश्वास को फिर से मजबूत करने का रास्ता इन मुद्दों को संबोधित करने, हल करने के लिए त्वरित, निर्णायक और पारदर्शी कार्रवाई में है… पारदर्शिता और जवाबदेही लोकतांत्रिक गुण हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, सरकारी सूत्रों की यह प्रतिक्रिया सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मुद्दे पर ‘गंभीर चिंता’ जताने और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों सहित न्यायपालिका के सदस्यों के ‘परेशान’ होने के कुछ ही समय बाद आई है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने जोर दिया कि अदालत किसी को भी ‘संस्था को बदनाम करने’ की अनुमति नहीं देगी और उन्होंने संज्ञान लिया है तथा स्वतः संज्ञान लेकर कार्रवाई शुरू कर सकते हैं।

वहीं, वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कक्षा 8 के छात्रों को ‘न्यायिक भ्रष्टाचार’ के बारे में पढ़ाने वाली एनसीईआरटी पुस्तक पर सवाल उठाया और इसे गंभीर चिंता का विषय बताया। सिब्बल ने एक पोस्ट में कहा था कि एनसीईआरटी की कक्षा 8 की पुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर एक खंड है! मंत्रियों, लोक सेवकों, जांच एजेंसियों सहित राजनेताओं के व्यापक भ्रष्टाचार का क्या? और सरकारें ऐसा क्यों करती हैं? क्या वे इसे नजरअंदाज कर देती हैं!

बता दें कि कुछ दिन पहले कानून मंत्रालय ने खुलासा किया था कि 2016 से 2025 तक भारत के मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय को सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के मौजूदा न्यायाधीशों के खिलाफ 7528 शिकायतें प्राप्त हुई थीं। वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंहवी ने भी आपत्ति जताई और कहा कि यह चयनात्मकता है… अन्य क्षेत्रों में भी भ्रष्टाचार है, लेकिन न्यायिक भ्रष्टाचार तो है ही।

अध्याय में क्या ?

संशोधित अध्याय में न्यायपालिका की भूमिका के बारे में बताया गया था। यह न्यायालयों के पदानुक्रम और न्याय तक पहुंच की व्याख्या से आगे बढ़कर भ्रष्टाचार और लंबित मामलों जैसी चुनौतियों पर चर्चा करता था। पुस्तक में कहा गया था कि न्यायाधीश एक आचार संहिता से बंधे होते हैं, जो अदालत के अंदर और बाहर उनके व्यवहार को नियंत्रित करती है। इसमें न्यायपालिका के आंतरिक जवाबदेही तंत्रों पर भी प्रकाश डाला गया था। साथ ही पारदर्शिता और जनविश्वास मजबूत करने के लिए संघीय एवं राज्य स्तर पर प्रयासों का जिक्र था, जिसमें प्रौद्योगिकी का उपयोग और भ्रष्टाचार के मामलों में त्वरित कार्रवाई शामिल थी।

क्या बोले वकील

एनडीटीवी से बात करते हुए वरिष्ठ वकील सिद्धार्थ लूथरा ने स्कूली शिक्षा पर सवाल उठाया, जो बच्चों के दिमाग को ‘शिक्षित’ करने के बजाय ‘जटिल’ बनाती है। उन्होंने कहा कि कक्षा 8 में उद्देश्य छात्रों को शासन के अंगों और उनके कार्यों से परिचित कराना है। वहीं, सुप्रीम कोर्ट की वकील प्रज्ञा परिजात सिंह ने कहा कि ‘गहन विश्लेषण’ के बिना भ्रष्टाचार का जिक्र करना समझ की कमी दर्शाता है। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका ने हमेशा बेहतर कानून बनाने का प्रयास किया है। हर चीज के फायदे और नुकसान होते हैं, लेकिन न्यायपालिका ने भारतीय लोकतंत्र को आकार देने में जो भूमिका निभाई है, उसका गहन विश्लेषण किए बिना इस तरह जिक्र करना समझ की कमी दिखाता है।

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