आजादी के बाद समूचे देश से राजतंत्र समाप्त हो गया है और टिहरी रियासत भी गणतंत्र में शामिल हो गई है, लेकिन यह उत्तराखंड की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत ही कही जाएगी कि राज्य की परंपरा में प्रतीकात्मक रूप से राजतंत्र आज भी जीवित है। प्राचीनकाल में राजा को भगवान का रूप कहा जाता था। इसलिए टिहरी नरेश को गढ़वाल में बुलांदा बदरी कहा जाता है। आज भी बदरीनाथ धाम के कपाट खुलने की तिथि पौराणिक परंपरा के अनुसार टिहरी नरेश ही घोषित करते हैं। हिन्दुओं के करोड़ों श्रद्धालुओं के आस्था का प्रतीक बदरीनाथ धाम के कपाट खुलने का मुहूर्त निकालने की परंपरा पौराणिक है।
मान्यता है कि जगदगुरू शंकराचार्य ने जब बदरीधाम की स्थापना की तभी से कपाट खुलने की तिथि टिहरी नरेश ही निकाल रहे हैं। वसंत पंचमी के दिन विधि-विधान से पूजा-अर्चना के बाद राज पुरोहित बद्रीधाम के कपाट खुलने का मुहूर्त निकालते हैं और इसकी घोषणा टिहरी राजा ही करते हैं। कई दशकों से नरेन्द्रनगर स्थित राजमहल मे यह परंपरा निभाई जा रही है। पौराणिक परंपरा के अनुसार आज भी गाडूघड़ा यात्रा राजमहल पहुंचती है। जहां कुंवारी और सुहागिन महिलाएं व्रत रखकर बदरीधाम के लिये तेल निकालती हैं। धाम में निकलने वाले तेल की शुद्धता के लिए महिलाएं मुंह पर पीला कपड़ा बांधकर तेल निकालती हैं। ताकि मुंह के जरिए अशुद्ध पदार्थ तेल में न पहुंचे। आज कपाट खुलने की होगी घोषणा ऋषिकेश। बदरीनाथ धाम के कपाट खुलने की घोषणा शु्क्रवार को वसंत पंचमी के दिन नरेंद्रनगर टिहरी राजमहल में होगी। गाडू कलश यात्रा शुक्रवार सुबह नरेन्द्रनगर पहुंच जाएगी। बदरी-केदार मंदिर समिति के प्रवक्ता हरीश गौड ने बताया कि शुक्रवार को राजपुरोहित पंचाग की गणना के आधार पर कपाट खुलने की तिथि और मुहूर्त निकालेंगे। नरेन्द्रनगर में तैयारियां पूरी कर ली गई हैं।
