देहरादून/ऑनलाइन। सहकार भारती के बुनकर प्रकोष्ठ की ऑनलाइन बैठक में प्रकृति संरक्षण, पर्यावरणीय संतुलन तथा सहकारिता के मूल सिद्धांतों पर गंभीर चिंतन किया गया। बैठक को संबोधित करते हुए बुनकर प्रकोष्ठ के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अनंत कुमार मिश्र ने कहा कि वर्तमान समय में प्रकृति का असंतुलन संपूर्ण मानव समाज के साथ-साथ सहकारिता आधारित विकास के लिए भी एक गंभीर चुनौती बनकर उभरा है। यदि मानव समय रहते प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को नहीं समझेगा तो विकास की सभी अवधारणाएं अधूरी रह जाएंगी।
श्री मिश्र ने अपने विस्तृत उद्बोधन में कहा कि प्रकृति ने मानव को जल, वायु, भूमि, वन, जीव-जंतु और खनिज संपदा जैसे अनगिनत संसाधन प्रदान किए हैं। इन संसाधनों के कारण ही मानव सभ्यता का विकास संभव हो पाया है। किंतु दुर्भाग्यवश आधुनिक युग में मनुष्य ने प्रकृति को केवल संसाधनों के भंडार के रूप में देखना शुरू कर दिया है। स्वार्थ और असीमित उपभोग की प्रवृत्ति ने प्रकृति और मानव के बीच के संतुलित संबंधों को कमजोर कर दिया है।
उन्होंने कहा कि पहले मनुष्य प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित कर जीवन यापन करता था, लेकिन आज स्थिति इसके विपरीत होती जा रही है। धरती के संसाधनों का अत्यधिक दोहन, जंगलों की कटाई, जल स्रोतों का प्रदूषण और प्राकृतिक संतुलन से छेड़छाड़ के परिणामस्वरूप जलवायु परिवर्तन, अनियमित वर्षा, बढ़ता तापमान तथा प्राकृतिक आपदाओं जैसी समस्याएं सामने आ रही हैं।
अपने संबोधन के दौरान श्री मिश्र ने कहा कि सहकारिता का अर्थ केवल आर्थिक सहयोग या संगठनात्मक विकास तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में परस्पर सहयोग और संतुलन की भावना का विस्तार है। जिस प्रकार मनुष्य-मनुष्य के बीच सहयोग आवश्यक है, उसी प्रकार मनुष्य और प्रकृति के बीच भी सहकार की भावना विकसित होनी चाहिए। प्रकृति के साथ संतुलित संबंध स्थापित किए बिना सतत विकास की कल्पना नहीं की जा सकती।
उन्होंने तीन महत्वपूर्ण बिंदुओं पर विशेष रूप से प्रकाश डाला। पहला, मानव ने प्रकृति से लगातार लिया है, लेकिन उसके संरक्षण और संवर्धन के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किए हैं। दूसरा, स्वार्थपूर्ण सोच और उपभोगवादी जीवनशैली ने प्रकृति के साथ हमारे संबंधों को कमजोर किया है। तीसरा, प्रकृति इतनी समृद्ध और विशाल है कि हम उसे वास्तव में कुछ लौटा नहीं सकते, लेकिन हम उसकी राह में अवरोध उत्पन्न न करें, यही सबसे बड़ा योगदान होगा।
राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित किया जाए। आने वाली पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक संसाधनों को सुरक्षित रखना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने कार्यकर्ताओं से अपने-अपने क्षेत्रों में पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण, वृक्षारोपण तथा प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग के प्रति जनजागरूकता बढ़ाने का आह्वान किया।
उन्होंने कहा कि सहकार भारती का उद्देश्य केवल आर्थिक आत्मनिर्भरता तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज में ऐसी चेतना विकसित करना भी है जो प्रकृति, संस्कृति और मानवीय मूल्यों के संरक्षण को बढ़ावा दे। स्वदेशी और सहकारिता की अवधारणा तभी सफल हो सकती है जब उसमें पर्यावरणीय जिम्मेदारी और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता भी शामिल हो।
अपने प्रेरणादायी उद्बोधन का सार प्रस्तुत करते हुए श्री मिश्र ने कहा, “प्रकृति माँ है, खान नहीं। उसका दोहन नहीं, दोहन के स्थान पर दोहना सीखना होगा। प्रकृति से उतना ही लें जितना आवश्यक हो और उसके संतुलन को बनाए रखने में अपना योगदान दें।”
बैठक में उपस्थित सदस्यों ने भी प्रकृति संरक्षण और सहकारिता के विषय पर अपने विचार साझा किए तथा पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाने का संकल्प लिया। कार्यक्रम के अंत में बुनकर प्रकोष्ठ के संयोजक श्री अनिल चंदोला ने राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अनंत कुमार मिश्र के प्रेरणादायी, मार्गदर्शक एवं विचारोत्तेजक उद्बोधन के लिए उनका आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि अध्यक्ष जी के विचार न केवल सहकारिता कार्यकर्ताओं के लिए बल्कि समाज के प्रत्येक वर्ग के लिए प्रेरणास्रोत हैं। साथ ही उन्होंने बैठक में जुड़े सभी पदाधिकारियों एवं सदस्यों का भी धन्यवाद ज्ञापित किया।
