मांडूवाला स्थित Dolphin (PG) Institute of Biomedical and Natural Sciences में आयोजित तीन दिवसीय ‘क्राफ्ट डेमोंस्ट्रेशन सह जागरूकता कार्यक्रम’ का गुरुवार 12 मार्च 2026 को गरिमामय समापन हुआ। कार्यक्रम के समापन अवसर पर पारंपरिक हस्तशिल्प विशेषकर भीमल फाइबर से बनने वाले उत्पादों को प्रोत्साहित करने, कारीगरों को आधुनिक बाजार से जोड़ने और उद्यमिता को बढ़ावा देने पर विशेष चर्चा की गई।
यह कार्यक्रम Ministry of Textiles के अंतर्गत विकास आयुक्त (हस्तशिल्प) के सहयोग से Rishikesh Natural Fiber Handicraft Producer Company Limited द्वारा आयोजित किया गया, जिसका उद्देश्य उत्तराखंड की पारंपरिक शिल्प कला को नई पहचान दिलाना और स्थानीय कारीगरों को आत्मनिर्भर बनाना है।

समापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में वीरेन्द्र दत्त सेमवाल, उपाध्यक्ष उत्तराखंड हथकरघा एवं हस्तशिल्प विकास परिषद तथा वरिष्ठ भाजपा नेता उपस्थित रहे। उन्होंने कार्यक्रम के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उत्तराखंड की पारंपरिक हस्तशिल्प कला हमारी सांस्कृतिक धरोहर है, जिसे संरक्षित करते हुए नई पीढ़ी तक पहुँचाना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि यदि पारंपरिक कला को आधुनिक डिजाइन, गुणवत्ता और मार्केटिंग के साथ जोड़ा जाए तो यह कारीगरों के लिए रोजगार और आय का मजबूत स्रोत बन सकती है।उन्होंने यह भी कहा कि सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं के माध्यम से कारीगरों को प्रशिक्षण, संसाधन और बाजार उपलब्ध कराए जा रहे हैं, जिससे वे अपने उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिला सकें।

कार्यक्रम के दौरान प्रतिभागियों को भीमल फाइबर से उपयोगी और आकर्षक उत्पाद तैयार करने की तकनीक, डिजाइन नवाचार और बाजार की मांग के अनुरूप उत्पाद विकसित करने का प्रशिक्षण दिया गया। कार्यशाला में लगभग 20 प्रतिभागियों ने भाग लिया और अनुभवी संसाधन व्यक्तियों के मार्गदर्शन में व्यावहारिक प्रशिक्षण प्राप्त किया।
प्रशिक्षण सत्रों में हस्तशिल्प विशेषज्ञ विमला नेगी, विमला चौहान, बसंती रावत और ममता नेगी ने प्रतिभागियों को भीमल फाइबर से विभिन्न प्रकार के उत्पाद बनाने की तकनीक सिखाई। इन सत्रों के माध्यम से कारीगरों को पारंपरिक कौशल के साथ-साथ आधुनिक डिजाइन, उत्पाद की गुणवत्ता और विपणन रणनीतियों की जानकारी भी दी गई।

कार्यक्रम के दौरान इंटरएक्टिव सत्र भी आयोजित किए गए, जिनमें विशेषज्ञों ने कारीगरों के साथ बाजार की संभावनाओं, उत्पाद की ब्रांडिंग और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यम से बिक्री बढ़ाने के तरीकों पर चर्चा की। प्रतिभागियों ने भी अपने अनुभव साझा किए और प्रशिक्षण को उपयोगी बताया।

इस आयोजन का संचालन कंपनी की निदेशक बीना पुंडीर के समन्वय और निदेशक अनिल चन्दोला के मार्गदर्शन में किया गया। उन्होंने बताया कि इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रम स्थानीय कारीगरों को आत्मनिर्भर बनाने और पारंपरिक हस्तशिल्प को नई पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

कार्यक्रम के सफल संचालन में संस्थान के अपर निदेशक (प्रशासन) सुनील कौल, डीन अकादमिक प्रो. ज्ञानेंद्र अवस्थी, डीन रिसर्च प्रो. वर्षा पर्चा, वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी सुधीर भारती सहित प्रबंधन टीम के सदस्य डॉ. श्रुति शर्मा, विपुल गर्ग और डॉ. आशीष रतूड़ी का विशेष योगदान रहा।

आयोजकों के अनुसार यह पहल न केवल उत्तराखंड की पारंपरिक कला और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने का प्रयास है, बल्कि क्षेत्र की महिलाओं और युवाओं को स्वरोजगार और आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ाने की एक महत्वपूर्ण पहल भी है। कार्यक्रम के दौरान प्रतिभागियों द्वारा तैयार किए गए हस्तशिल्प उत्पादों का प्रदर्शन भी किया गया, जिसे उपस्थित लोगों ने काफी सराहा।

