हिमालय पर नई रिसर्च में बड़ा संकट सामने, जमीन की गर्मी से भी पिघल रहे ग्लेशियर

उच्च हिमालयी क्षेत्रों के ग्लेशियरों में भूतापीय गर्मी का नकारात्मक प्रभाव नजर आने लगा है। हाल के अध्ययन में पता चला है कि न केवल वैश्विक तापमान ग्लेशियर की ऊपरी परत को पिघला रहा है बल्कि भूगर्भीय ताप भी ग्लेशियर के अंदरूनी हिस्सों के लिए नुकसानदायक साबित हो रहा है। लद्दाख क्षेत्र के चार ग्लेशियरों पर इस बदलाव का असर देखने को मिला है। यह शोध फिजिकल ज्योग्रॉफी जर्नल में प्रकाशित हुआ है।

वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान के ताजा शोध में हिमालयी क्षेत्रों में मौसम बदलने और उसके नकारात्मक बदलावों के स्पष्ट संकेत मिले हैं। एरोसोल, माइक्रो प्लास्टिक प्रदूषण, बढ़ते वैश्विक तापमान की चुनौतियां और बर्फबारी की कमी के अलावा अध्ययन में पता चला है कि भूतापीय गर्मी से भी ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। उनके आसपास की झीलों का आकार बढ़ रहा है, जो आने वाले समय में बड़ा खतरा बन सकते हैं।

लद्दाख में काफी पिघल रही बर्फ

लद्दाख के पेनसिलुंगपा ग्लेशियर में 2023 और 2024 के दौरान काफी बर्फ पिघली है। खासकर 4800 से 5000 मीटर की ऊंचाई पर सबसे ज्यादा पिघलाव देखा गया। जहां मोटा मलबा था वहां पिघलने की रफ्तार थोड़ी कम रही। ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार तेज होने से नदियों का पानी भी बढ़ रहा है। लद्दाख में पार्वाचिक नदी का बहाव 2023 में अपने सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंचा। पेनसिला दर्रे के पास झीलों का आकार बढ़ा है। डुरुंग डांग ग्लेशियर के पास झील का क्षेत्र और पानी दोनों कई गुना बढ़ गए हैं।

क्या कहते हैं एक्सपर्ट

ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। इससे पानी की उपलब्धता और बाढ़ जैसी आपदाओं का खतरा बढ़ सकता है। हिमालय में हो रहे ये बदलाव आने वाले समय के लिए चेतावनी हैं। हमें अभी से सावधान रहने की जरूरत है। -डॉ. मनीष मेहता, वरिष्ठ वैज्ञानिक, वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान।

लगातार पीछे खिसक रहे ग्लेशियर

लद्दाख में डुरुंग डांग ग्लेशियर करीब 166 मीटर और पेनसिलुंगपा ग्लेशियर करीब 80 मीटर पीछे हट चुका है। लद्दाख की पदम वैली के अध्ययन में पता चला है कि झील के संपर्क वाले ग्लेशियर ज्यादा तेजी से पिघल रहे हैं। पिछले तीन दशक के डेटा विश्लेषण में यह पाया गया कि इस दौरान पदम ग्लेशियर करीब 784 मीटर पीछे हटा। नाटियो नाला ग्लेशियर करीब 324 मीटर पीछे खिसका। पदम ग्लेशियर के पास बनी झील का क्षेत्रफल भी बढ़कर 0.35 वर्ग किमी से 0.56 वर्ग किमी हो गया। इन ग्लेशियरों का मास बैलेंस यानी बर्फ का संतुलन भी नकारात्मक पाया गया है। इसका मतलब है कि जितनी बर्फ बन रही है, उससे ज्यादा पिघल रही है। यह स्थिति लंबे समय में ग्लेशियरों के खत्म होने का संकेत देती है।

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